भारत और पाकिस्तान के बीच कैसे कम हो सकता है तनाव और कौन है जो इस आग में घी डाल रहा है?

14 फरवरी को भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा में हुए आत्मघाती हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के संबंधों में तनाव इस हद तक बढ़ चुका है कि अब बातचीत के माध्यम से सुलह की संभावना कम होती जा रही हैं और यह बात इस आधार पर कही जा सकती है क्योंकि दोनों देशों की ओर से जो क़दम उठाया गया है वह बिना सोचे-समझे, बल्कि यह कहा जा सकता है कि दोनों देशों की बागड़ोर जिनके हाथों में है वे केवल राजनीतिक लाभ के बारे में ही सोच रहे हैं।

आप अगर कुछ दशक पहले के युद्धों के बारे में पढ़ेंगे तो आपको इस बात का एहसास ज़रूर हो जाएगा कि पहले ज़्यादातर युद्ध, दो देशों की सेनाओं के बीच हुआ करता था और युद्धग्रस्त देशों की जनता या मीडिया इन युद्धों में उस तरह शामिल नहीं होती थी जिस तरह आज के दौर में देखा जा रहा है। लेकिन जब से पेड-मीडिया और सोशल मीडिया ने अपने पैर पसारे हैं तबसे दो देशों के बीच उत्पन्न होने वाले तनाव या युद्ध को यह राजनीतिक स्तर पर पूरे देश और दुनिया में एक अभियान बना देते हैं।

इस समय भारत और पाकिस्तान की जो स्थिति है उसके लिए जहां दोनों देशों के मीडिया और सोशल मीडिया पर सक्रिय लोग ज़िम्मेदार हैं वहीं इन देशों के बड़बोले नेताओं का रोल भी बहुत अहम है। जहां भारत में इस समय सत्ता में बैठी पार्टी में एक से बढ़कर एक बड़बोले नेता हैं वहीं पाकिस्तान में भी शीर्ष पदों पर बैठे बड़बोले नेताओं की कमी नहीं है और यह ऐसे ही नेता हैं जो दोनों देशों के संबंधों में भड़की आग में घी का काम कर रहे हैं। ऐसे में न पाकिस्तान के पास कोई ऐसा तरीक़ा है और न भारत के पास कोई विकल्प है जिसका उपयोग करके बिना नुक़सान उठाए इस राजनीतिक अभियान को रोका जा सके। क्योंकि भारतीय नेतृत्व को भी अपना सिंहासन बचाना है तो पाकिस्तानी नेतृत्व को भी अपनी नई नवेली राज गद्दी को बचाए रखना है।

किसी भी देश की सेना द्वारा सैन्य कार्यवाही आरंभ करने के कुछ चरण होते हैं और पूरी दुनिया में सैनिकों के बीच में एक निजी भाषा होती है जो कि दोनों तरफ़ के सैनिक समझते हैं और कोई भी देश की सेना एक दम से चार से पांच चरण ऊपर की कार्यवाही नहीं करती है। अब अगर भारत और पाकिस्तान के वर्तमान संबंधों की बात करें तो बात कोई बहुत ज़्यादा आगे नहीं गई है, लेकिन कठिनाई यह है कि अब तनाव को कम करना दोनों देशों की सेना के हाथ में नहीं है। हालांकि, यह कहना ज़्यादा सही होगा कि वर्ष 2016 के बाद से युद्ध स्थिति पर सेना का कंट्रोल नहीं रह गया है क्योंकि 2016 से पहले भी सर्जिकल स्ट्राइक जैसे क्रॉस बॉर्डर ऑपरेशन होते थे और इनकी मंज़ूरी भी राजनीतिक नेतृत्व ही देता था, लेकिन सार्वजनिक रूप से उनका प्रचार नहीं किया जाता था।

अब समस्या यह है कि आमने-सामने खड़े सैनिकों के आधार पर तार्किक विश्लेषण नहीं किया जा रहा है कि कोई क़दम उठाने से क्या नुक़सान होगा या क्या फ़ायदा होगा? अब हानि-लाभ का पैमाना चुनाव जीतने-हारने पर आधारित है, अब कोशिश बस यह है कि क्या करें कि चुनाव में हमारी जीत हो जाए। अब अगर इमरान ख़ान के बुधवार को दिए गए बयान की बात करें जिसमें उन्होंने युद्ध से बचने की अपील की है तो हमें यह समझना होगा कि हारकर कोई भी बातचीत के लिए तैयार नहीं होगा। इस समय इमरान ख़ान अगर यह कह रहे हैं कि वह बातचीत के लिए तैयार हैं तो उसका कारण यह है कि पाकिस्तान ने भारत के एक विमान को मार गिराया है और एक पायलट को गिरफ़्तार कर लिया है। लेकिन अब भारत बातचीत का प्रस्ताव स्वीकार नहीं कर सकता है, क्योंकि अब राजनीतिक लाभ का मामला है।

अब प्रश्न यह उठता है कि दोनों देशों में इतना आपसी तनाव बढ़ गया है कि अब शांति कैसे स्थापित होगी? तो इसका उत्तर यह है कि ऐसी परिस्थितियों में शांति की स्थापना के लिए ज़रूरी है कि दोनों देशों के सामने एक ऐसी स्थिति प्रकट हो जिसमें दोनों ही देशों की जीत दिखाई दे और जब तक वह समय नहीं आता कि दोनों ही देश इस संघर्ष में खुद को विजेता घोषित कर सकें तब तक यह संघर्ष जारी रहेगा। वैसे इस संघर्ष को रोकने का एक और रास्ता है और वह यह है कि कुछ दिनों के लिए दोनों देशों की मीडिया और सोशल मीडिया पर रोक लगा दी जाए वैसे यह रोक सत्ता में बैठी पार्टियां तो नहीं लगाएंगी, तो इसके लिए दोनों देशों की शांतिप्रिय जनता को सामने आना होगा और ऐसे सभी चैनलों और समाचारपत्रों सहित उन सभी साइटों का बहिष्कार करना होगा जिनका काम केवल जलते हुए घरों से हाथ तापना है। (रविश ज़ैदी)

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