भारत के पायलट को रिहा करने की जल्दी में क्यों था पाकिस्तान?

विंग कमांडर अभिनंदन की रिहाई के बारे में भारतीय मीडिया में यह भी कहा गया कि जेनेवा कन्वेन्शन के आधार पर उसकी रिहाई होनी ही थी बल्कि आठ दिन के भीतर पाकिस्तान को पायलट को रिहा करना ही पड़ता। जेनेवा कन्वेन्शन को दोनों ओर से अपनी अपनी मर्ज़ी के अनुसार परिभाषित किया जा रहा है। प्राचीन और हालिया समय की कुछ मिसालों को देखकर समझा जा सकता है कि जेनेवा कन्वेन्शन कितना प्रभावी साबित हुआ है।

पहली मिसाल रूस बनाम यूक्रेनः

पिछले साल नवम्बर में जब रूस और यूक्रेन के बीच तनाव बढ़ गया तो रूस ने काला सागर में क्रीमिया प्रायद्वीप में यूक्रेन की नौसेना की दो युद्धक नौकाओं सहित तीन जहाज़ों पर हमला करके उन्हें अपने नियंत्रण में ले लिया। इस घटना में यूक्रेन के जहाज़ों में मौजूद कर्मीदल के लोग घायल हो गए। रूस ने यूक्रेन के जहाज़ों पर अपनी सीमा मे ग़ैर क़ानूनी रूप से प्रवेश करने का आरोप लगाया और यूक्रेन के नाविकों को युद्ध बंदी मानने से इंकार कर दिया। रूस का कहना है कि यूक्रेन से उसका कोई घोषित युद्ध नहीं हो रहा है इसलिए यूक्रेनी नौसेना के गिरफ़तार नाविकों को युद्धबंदी का दर्जा नहीं दिया जा सकता।

दूसरी मिसाल दक्षिण कोरिया बनाम उत्तर कोरियाः

एक और उदहारण उत्तरी और दक्षिणी कोरियाओं का युद्ध है। 70 साल से दोनों देशों के बीच एक भी गोली नहीं चली लेकिन यह जंग समाप्त भी नहीं हुई है जिसका बड़ा कारण युद्ध बंदियों का आदान प्रदान न हो पाना है। दोनों देशों ने युद्ध विराम तो कर लिया लेकिन दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ने देश के विभाजन को स्वीकार करने से इंकार कर दिया। 1953 क़ैदियों का आदान प्रदान हुआ लेकिन उत्तरी कोरिया ने 8 हज़ार युद्ध बंदी रोक लिए वर्ष 2010 में इनमें से 560 युद्ध बंदी जीवित थे जो अब भी उत्तरी कोरिया के ही पास हैं।

तीसरी मिसाल कारगिल युद्धः

कारगिल युद्ध में भारत के फ़्लाइट लेफ़्टिनेन्ट निचेकिता 27 मई 1999 को पाकिस्तान के हाथ लगे और पाकिस्तान ने एक हफ़्ते बाद उन्हें भारत के हवाले कर दिया।

इन तीन उदाहरणों से कुछ बातें समझी जा सकती हैं,

पहली चीज़ तो यह कि रूस ने यूक्रेन के साथ युद्ध को मानने से इंकार कर दिया और युक्रेन के क़ैदियों को युद्ध बंदी का दर्जा नहीं दिया। इस बारे में तीसरा जेनेवा कन्वेन्शन लागू होने की बात की जाती है जिसमें कहा गया है कि यह कन्वेन्शन घोषित युद्ध या किसी सशस्त्र झड़प सहित दोनों स्थिति में लागू होता है। रूस तीसरे जेनेवा कन्वेन्शन के तहत यूक्रेन के गिरफ़तार नाविकों को युद्ध बंदी नहीं मान रहा है।

तीसरा उदाहरण कारगिल युद्ध का है। पाकिस्तान ने उस समय भी युद्ध का एलान न होने के बावजूद भारतीय पायलट को लौटाया था जिसका लक्ष्य तनाव कम करना था। इस बार भी पाकिस्तान ने अभिनन्दन को इसी लिए वापस भेज दिया कि वह साबित करना चाहता था कि इस्लामाबाद युद्ध नहीं चाहता।

विंग कमांडर अभिनन्दन की रिहाई पाकिस्तान की ओर से विश्वास बहाली का एक क़दम कहा जा सकता है जो क्षेत्र में शांति की सबसे बड़ी ज़रूरत है। इसे जेनेवा कन्वेन्शन से जोड़कर देखना या किसी की विजय अथवा कमज़ोरी समझना विश्वास बहाली के प्रयासों को नुक़सान पहुंचाने के समान है।

विश्वास बहाली के लिए बड़े संयम से काम करने की ज़रूरत है, इसमें तत्काल परिणाम मिलने की अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए। स्थायी शांति के लिए उठाया गया यह क़दम सही दिशा का निर्धारण कर रहा है।

 

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