सऊदी नरेश और क्राउन प्रिंस में गहरे मतभेद की ख़बरों में कितनी है सच्चाई? क्या जान बूझकर ख़ुद बिन सलमान यह ख़बरें लीक करवा रहे हैं?

इस रिपोर्ट को मीडिया में विशेष रूप से चर्चा का विषय बनाया गया लेकिन रिपोर्ट में जो जानकारियां दी गई हैं यदि उन पर विचारा किया जाए तो आसानी से समझ में आ जाता है कि यह जानकारियां सटीक नहीं हैं। इसलिए कि इस रिपोर्ट को देखकर लगता है कि इसे लिखने वाले को सऊदी अरब के सत्ताधारी परिवार के बीच जारी नियमों और शैलियों की पूरी जानकारी नहीं है।

रिपोर्ट में बताया गया कि बिन सलमान ने दो नियुक्तियां कीं जिन पर सऊदी नरेश को आपत्ति है। एक तो उन्होंने अपने भाई ख़ालिद बिन सलमान को जो अमरीका में सऊदी अरब के राजदूत थे उप रक्षा मंत्री अर्थात अपनी डिप्टी बना लिया है जबकि रीम बंदर बिन सुलतान को उन्होंने ख़ालिद बिन सलमान के स्थान पर सऊदी अरब का राजदूत बनाया है। मुहम्मद बिन सलमान ने दोनों नियुक्तियां तब कीं जब सऊदी नरेश सलमान बिन अब्दुल अज़ीज़ मिस्र की यात्रा पर थे। रिपोर्ट में एक अन्य मतभेद का भी उल्लेख किया गया है यह मतभेद यमन युद्ध के क़ैदियों के संबंध में बिन सलमान की नीतियों के बारे में है। इसी तरह अलजीरिया और सूडान में जारी परिवर्तनों के बारे में भी दोनों के बीच मतभेद होने की बात कही गई थी।

सच्चाई यह है कि मुहम्मद बिन सलमान ही इस समय सऊदी अरब के असली शासक हैं क्योंकि उनके पिता सलमान बिन अब्दुल अज़ीज़ का स्वास्थ्य काफ़ी ख़राब है और वह मुद्दों पर ध्यान नहीं दे पाते इसीलिए वह आंतरिक और विदेशी राजनैतिक मंचों से ग़ायब रहते हैं। सऊदी नरेश से यदि किसी भी अधिकारी की कोई मुलाक़ात होती है तो वह बहुत संक्षिप्त होती है जिसका उद्देश्य साथ में बैठकर क़हवा पी लेना और फ़ोटो खिंचा लेना होता है। यह बाद एक राष्ट्राध्यक्ष के प्रतिनिधि मंडल का हिस्सा रह चुके एक अधिकारी ने बताई जिसने हाल ही में सऊदी अरब का दौरा किया और सऊदी नरेश से मुलाक़ात की।

सऊदी अरब में यह रीति ही नहीं है कि क्राउन प्रिंस नरेश की उपेक्षा करके कोई फ़ैसला कर ले और उसकी स्वीकृति के बग़ैर कोई आदेश जारी करे। सेकेंड्री ग्रेड के मामलों में भी यह नहीं होता। इसलिए कि नरेश की उपेक्षा को विद्रोह माना जाता है। यदि शाह सलमान का स्वास्थ्य ठीक होता तो वह इस उपेक्षा को हरगिज़ सहन न करते बल्कि तत्काल क्राउन प्रिंस को बर्खास्त कर देते। उनके शासनकाल के शुरुआती तीन महीनों के भीतर दो क्राउन प्रिंस बर्ख़ास्त किए जा चुके हैं। यही नहीं शाह अबदुल्लाह बिन अब्दुल अज़ीज़ भी लगभग दस साल तक क्राउन प्रिंस रहते हुए इस पराम्परा का पालन करते रहे हालांकि उनके भाई शाह फ़हद का स्वास्थ्य ख़राब हो चुका था और दिल की बीमारी के कारण उनकी याद्दाश्त भी बहुत कमज़ोर हो गई थी। अब्दुल्लाह को हमेशा यह डर था कि शाह फ़हद ने अपना शासनकाल शुरू होते ही जो व्यवस्था तैयार की थी उसके तहत वह उन्हें क्राउन प्रिंस के पद से कभी भी हटा सकते हैं। यह अटकलें भी थीं कि शाह फ़हद ने यह व्यवस्था इसलिए बनाई थी कि अब्दुल्लाह बिन अब्दुल अज़ीज़ को हटाकर शाह फ़हद अपने बेटे अब्दुल अज़ीज़ बिन फ़हद को क्राउन प्रिंस बनाना चाहते थे, मगर बीमारी ने उन्हें इसका मौक़ा नहीं दिया। अब सऊदी अरब में एक बार फिर वही स्थिति पैदा हो गई है।

ख़ालिद बिन सलमान को उनकी कम उम्र के बावजूद उप रक्षा मंत्री इसलिए बनाया गया है कि जब क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान सऊदी नरेश का तख्त संभालेंगे तो ख़ालिद उनके क्राउन प्रिंस बन जाएंगे और यह क़दम शायद बहुत जल्द उठाया जाए क्योंकि सऊदी नरेश का स्वास्थ्य बहुत ख़राब है।

जहां तक रीम बिंते बंदर बिन सुलतान को वाशिंग्टन में सऊदी अरब की राजदूत नियुक्त करने का विषय है तो यह क़दम आंतरिक व विदेशी राजनैतिक कारणों से उठाया गया। एक तो रीम के पिता बंदर बिन सुलतान को ख़ुश करने खुश करने के लिए यह क़दम उठाया गया था क्योंकि बंदर बिन सुलतान ने शुरू ही से मुहम्मद बिन सलमान के क्राउन प्रिंस बनने का समर्थन किया। दूसरी बात यह है कि सऊदी अरब में राजनैतिक व सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ़तारी और उन्हें यातनाएं दिए जाने के मामले में सऊदी अरब पर विदेशों से भारी दबाव पड़ रहा है। रीम को राजदूत बनाकर यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि सऊदी सरकार महिलाओं के अधिकारों का सम्मान करती है और उन्हें महत्वपूर्ण मामलों में भागीदारी देने की पक्षधर है।

गार्डियन की रिपोर्ट में एक बिंदु का उल्लेख विशेष रूप से किया गया था कि जब सऊदी नरेश मिस्र से लौटे तो उनके स्वागत के लिए अन्य अधिकारियों के साथ मुहम्मद बिन सलमान मौजूद नहीं थे। मगर यह मतभेद की वजह से नहीं बल्कि सुरक्षा कारणों से हो सकता है। मुहम्मद बिन सलमान ने जब से कई राजकुमारों को गिरफ़तार किया और उनसे मोटी रक़्में वसूलीं तब से वह अपनी सुरक्षा पर बहुत अधिक ध्यान देते हैं। वैसे भी कुछ राजकुमार एसे हैं जो बिन सलमान को क्राउन प्रिंस मानने को तैयार नहीं हैं। इस प्रकार के राजकुमारों को हाशिए पर डाल दिया गया है और उनकी ओर से कभी भी किसी बग़ावत की आशंका बनी रहती है।

इस बात की भी संभावना है कि जो रिपोर्ट गार्डियन अख़बार में छपी है वह खुद बिन सलमान ने ही लीक करवाई हो ताकि यह संदेश जा सके कि सऊदी नरेश का स्वास्थ्य ठीक है और वह देश के मामलों को खुद संभाल रहे हैं। बिन सलमान ने इस तरह विदेशी मीडिया की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न चिन्ह लगाने की कोशिश की है ताकि सऊदी पत्रकार जमाल ख़ाशुक़जी की निर्मम हत्या के संबंध में पश्चिमी मीडिया में जो रिपोर्टें छप रही हैं उनकी सत्यता पर भी सवालिया निशान लग जाए।

यहां यह याद दिला देना उचित होगा कि जब फ़िलिस्तीन के मामले में शर्मनाक समझौते डील आफ़ सेंचुरी को सऊदी क्राउन प्रिंस की ओर से समर्थन दिए जाने की कड़ी आलोचना होने लगी तो सऊदी नरेश के नाम से एक फ़रमान जारी किया गया जिसमें उन्होंने फ़िलिस्तीन का समर्थन किया था और इस बात पर ज़ोर दिया था कि बैतुल मुक़द्दस फ़िलिस्तीन की राजधानी है, फ़िलिस्तीनी शरणार्थियों को अपने देश लौटने का पूरा अधिकार है और साथ ही फ़िलिस्तीनी प्रशासन के प्रमुख महमूद अब्बास को रियाज़ यात्रा का न्योता दिया गया था। सऊदी सूत्रों का कहना है कि यह फ़रमान भी ख़ुद बिन सलमान ने ही जारी किया था ताकि डील आफ़ सेंचुरी के मामले में सऊदी अरब पर होने वाली कठोर टिप्पणियों को रोका जा सके।

आख़िर में हम यही कहेंगे कि मुहम्मद बिन सलमान ही इस समय सऊदी अरब के असली शासक हैं, हर छोटा बड़ा फ़ैसला वही कर रहे हैं, जितने भी शाही फ़रमान जारी हुए हैं वह सब उन्होंने खुद जारी किए हैं शाह सलमान को शायद इनमें से अधिकतर के बारे में सूचना भी न हो। बाप बेटे में किसी भी प्रकार के मतभेद की बात करना वास्तव में मीडिया और जनमत को गुमराह करने की कोशिश है ताकि सऊदी अरब के संबंध में विश्व स्तर पर जिस प्रकार का माहौल बना है उससे लोगों और मीडिया का ध्यान हटाया जा सके।

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