मध्यपूर्व में विफल हुई अमरीकी योजना

इस्लामी प्रतिरोध आन्दोलन हिज़बुल्लाह के महासचिव सैयद हसन नसरुल्लाह ने कहा है कि अमरीका ने इस्लामी प्रतिरोध को सदा के लिए समाप्त करने के उद्देश्य से सन 2006 में एक योजना बनाई थी जिसे प्रतिरोध ने विफल बना दिया। उन्होंने बताया कि कुछ क्षेत्रीय देशों का समर्थन प्राप्त अमरीकी-इस्राईली इस योजना को प्रतिरोध ने नाकाम बना दिया। सैयद हसन नसरुल्लाह ने हिज़्बुल्लाह को ब्रिटेन द्वारा आतंकवादियों की सूची में शामिल करने के विषय की ओर संकेत करते हुए कहा कि वर्ष 2011 से प्रतिरोध को नुक़सान पहुंचाने की योजना शुरु की गई। उन्होंने कहा कि इराक़ में दाइश को वापस लाना तथा लेबनान, फ़िलिस्तीन और यमन पर जारी दबाव इसी का भाग था। सैयद हसन ने कहा कि हालांकि इस बात की अपेक्षा की जा रही थी कि प्रतिरोध के विरुद्ध अमरीकी प्रतिबंध प्रभावी सिद्ध होंगे किंतु एसा कुछ नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि प्रतिरोध का केन्द्र वही पक्ष है जो अमरीकी योजना डील आफ सेन्चुरी का प्रबल विरोधी है। यह एक वास्तविकता है कि अमरीका विभिन्न अवसरों पर मध्यपूर्व के लिए अपने षडयंत्र लागू करता आया है और डील आफ सेंचुरी इसी का एक भाग है। इस षडयंत्र का मूल उद्देश्य मध्यपूर्व में प्रतिरोध के केन्द्र को समाप्त करके अवैध ज़ायोनी शासन को मध्यपूर्व की बड़ी शक्ति के रूप में पेश करना है। जार्ज बुश के काल में ग्रेटर मिडिल ईस्ट योजना पेश की गई जिसे लागू करने के प्रयास जारी रहे। सन 2006 में 33 दिवसीय युद्ध इसी षडयंत्र का ही एक भाग था जिसमें इस्राईल को हिज़बुल्लाह से मुंह की खानी पड़ी। सैयद हसन नसरुल्लाह कह चुके हैं कि लेबनान में कड़े प्रतिरोध ने ज़ायोनी शासन को परास्त किया। 33 दिवसीय युद्ध की एक उपलब्धि, ज़ायोनी शासन की अजेय छवि को मिटाने में सफल रही। मध्यपूर्व में बाद के परिवर्तनों ने दर्शा दिया कि क्षेत्र में अमरीका के नए षडयंत्र को लागू करने की योजना थी किंतु 33 दिवसीय युद्ध में लेबनान के प्रतिरोध ने इस षडयंत्र को विफल बना दिया। इसके बाद फ़िलिस्तीनियों के साथ युद्ध में भी अवैध ज़ायोनी शासन को लगातार विफलताओं का सामना करना पड़ा। यह परिवर्तन, मध्यपूर्व के बारे में अमरीकी षडयंत्र की अधिक विफलता के परिचायक हैं जो ज़ायोनी शासन के लिए अधिक अपमान के सूचक हैं। इन सबका श्रेय इस्लामी प्रतिरोध को जाता है।

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