सु्प्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू द्वारा कुरआन के एक कथन पर की गई टिप्पणी पर जवाब

अक़ील अब्बास साराणि

अपनी बेबाक राय के लिए जाने जाते सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू ने तारीख 30 मार्च 2019 को अपने फेसबुक पेज पर कुरआन के एक कथन के हवाले से टिप्पणी करते हुए लिखा के, कुरआन में सुरे निसा के कथन नंबर 34 में बताया गया है के पत्नियों को अपने पति का पालन करना चाहिए, और पति अपनी पत्नियों को कुछ स्थितियों में चोट पहुंचा सकते हैं। काटजू ने अपनी बात में आगे लिखा के क्या यह आज की आधुनिक दुनिया में स्वीकार्य है जहाँ महिलाओं को बराबरी का माना जाना चाहिए? पत्नियों को अपने पति की बात क्यों माननी चाहिए? वे अपने पति की सेवक नहीं हैं, और उन्हें पति के बराबर माना जाना चाहिए, और उन्हें क्यों पीटा जाना चाहिए?

मार्कंडेय काटजू ने जिस तरह की टिप्पणी की है यह दर्शाता है के उन्होंने कुरआन का अभ्यास नहीं किया है, मगर किसी एक जगह से कुरआन के किसी एक कथन को लेकर उसका गलत अर्थघटन किया। अगर वास्तव में उन्होंने कुरआन का अभ्यास किया होता तो उन्हें पता होता के कुरआन में एसे बहुत से कथन है जिस का सिर्फ ज़ाहिरी अर्थ निकाल के उसपर टिप्पणी करना सही नहीं है परंतु गहन अध्ययन करने के बाद फिर किसी नतीजे पर पहुंचा जा सकता है।

कुरआन के सूरा फ़ातिर के कथन नंबर 32 में खुदा ने कहा है: “फिर हमने अपने बंदो में से ख़ास को इस किताब का उत्तराधिकारी बनाया…” इस कथन से ये बात स्पष्ट होती है के कुरआन को समझने के लिए कुरआन के ज्ञानी और उत्तराधिकारी की ज़रूरत है। और उनमें सबसे पहले खुद पयगम्बर हज़रत मोहम्मद मुस्तफा (स.अ.व.व.) है और उनके बाद वो लोग है जो पयगम्बर के इल्म के वारिस है जिन्हें अहलेबैत (अ.स.) कहा जाता है। और ये बात खुद पयगम्बर ने अपनी वफात (मृत्यु) से पहले कही है के, “मै आप लोगों के दरमियान दो कीमती चीजों को छोड़ के जा रहा हूँ जिसमे एक कुरआन और दुसरे अहलेबैत (अ.स.) है।“

आज अगर किसीको कुरआन समझना है तो उन्हें चाहिए के वो उन उलमा से कुरआन के कथन को समझे जो पयगम्बर और अहलेबैत के रास्तों पर चल रहे है जिन्हें हम अम्बिया के हक़ीकी वारिस कह सकते है।

मगर, अगर मार्कंडेय काटजू को इतनी मेहनत नहीं भी करनी थी तब भी कम से कम कुरआन के कथन का सही अनुवाद का ही पठन कर लेते तो भी शायद वो आज ऐसी बात ना करते जो उन्होंने कही।

क़ुरआन में सूरे हुजरात के कथन नंबर 13 में कहा गया है के “ए लोगो! हमने तुम्हे एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और तुम्हे बिरादरियों और कबीलों का रूप दिया, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानों। वास्तव में अल्लाह के यहाँ तुममें सबसे अधिक प्रतिष्ठित वह है जो तुममें सबसे अधित तक़वा रखता है…”; इस कथन से ये बात साफ़ हो रही है के इस्लाम की नज़र में सारे लोग बराबर है और उस इंसान का स्थान ऊँचा है जो तक़वा रखता है, तक़वा का मतलब होता है गुनाहों से दूर रहेना, अपने मूल्यों को बाकी रखना और अपनी इज़्ज़त को बचाये रखना।
क़ुरआन के इस कथन से ये बात सामने आती है के इस्लाम में उंच-नीच का कोई भेदभाव नहीं है और सारे इंसान बराबर है; और इस्लाम में उनका स्थान ऊँचा है जो तक़वा रखता है।

अब आइए बात करते है कुरआन के उस कथन की जिसके बारे में मार्कंडेय काटजू ने अपने फेसबुक पेज पर टिप्पणी की। कुरआन के सुरे निसा के कथन नंबर 34 और 35 में कहा गया है के “मर्द (पति) औरतों (पत्नियों) के सरपरस्त, संरक्षक और ख़िदमत गुज़ार है उन उत्कृष्टताओं की वजह से (शारीरिक शक्ति, सामाजिक व्यवस्था के संदर्भ में) ख़ुदा ने एक को दुसरे पर दी है और उस कारण के अपनी संपत्ति में से माल खर्च करते है (अपनी पत्नियों के लिए); तो अच्छी, धार्मिक और योग्य पत्नियाँ वह है जो आज्ञापालन करनेवाली होती है और जो (अपने पति की) गैर मौजूदगी में उसके राज़ (गुप्त बातों) और अधिकारों की रक्षा करती है क्योंकि अल्लाह ने उनकी रक्षा की है। और जो पत्नियाँ एसी हो जिनके विद्रोह या विरोध का तुम्हे भय हो, उन्हें समझाओ, उपदेश और सलाह दो; और अगर ये (समझाना, उपदेश और सलाह) असर न करे तो उनके बिस्तर से दूर हों, और अगर ये भी कारगर साबित न हो और सख्ती के अलावा कोई और रास्ता उन्हें अपनी ज़िम्मेदारियाँ सँभालने के लिए तैयार न करें तब उन्हें खबरदार (सख्ती) करों, अब अगर वह तुम्हारी बात मान लें तो उन पर सख्ती और ज़्यादती न करों (और जान लों) के ख़ुदा सब से उच्च, सबसे महान है। और अगर उन के दरमियान (पति-पत्नी के बिच) जुदाई का भय हो तो फैसला करने के लिए एक प्रतिनिधि पति के घरवालों की तरफ से और एक प्रतिनिधि पत्नी के घरवालों की तरफ से नियुक्त करो (ताकि वह ये मामला हल करें), अब अगर ये दोनों फैसला करनेवाले सुधार और इस्लाह का इरादा रखते हों तो ख़ुदावंदे आलम उन दो लोगों के बिच भी अनुकूलता पैदा कर देगा। निसंदेह, अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, ख़बर रखनेवाला है।”

कुरआन के इस दो कथन के अनुवाद के बाद आइए अब देखते है इसमें क्या कहा जा रहा है। सब से पहले घरेलू व्यवस्था में सरपरस्ती और संरक्षण की बात कही गयी है। मर्दों को औरतों के सरपरस्त, संरक्षण देने वालें और ख़िदमत गुज़ार कहा गया है। यहाँ ये बात ध्यान में रहे के घर, समाज का एक छोटा हिस्सा है या ये भी कह सकते है के एक छोटा समाज है, और बड़े समाज की तरह इसका भी कोई लीडर, सरपरस्त और संरक्षण देनेवाला होना चाहिए क्योंकी अगर मर्द और औरत दोनों मिलकर सरपरस्ती और लीडरी करे ये व्यर्थ है इसलिए मर्द या औरत में से कोई एक घर का लीडर और सरदार होना चाहिए और दूसरा उसका मददगार और उसकी निगरानी में हों। कुरआन ने यहाँ साफ़-साफ़ कहाँ है के सरपरस्ती और संरक्षण देने की ज़िम्मेदारी मर्द को दी जाए इसका अर्थ ज़ुल्म और सितम नहीं है बल्कि एक संगठनात्मक नेतृत्व है जिसमे एक-दूसरों की जिम्मेदारियों की तरफ ध्यान आकर्षित किया गया है और इन जिम्मेदारियों में असमानता या अंतर का कारण भी बताया गया है। ये ध्यान रहें के इन जिम्मेदारियों में असमानता न मर्द के लिए उनके व्यक्तित्व की ऊंचाई की दलील है और न ही आखेरत के अंकों में बढ़ोतरी; क्योंकी वह सिर्फ तक्वा और परहेज़गारी है जिससे इंसान अपना स्थान ऊँचा कर सकता है (जिसका वर्णन शुरू में किया गया)
मर्द और औरत की जिम्मेदारियों के बाद कुरआन में दो तरह की औरतों का वर्णन किया गया है। एक वह जो योग्य और अपनी जिम्मेदारियों को समझने वाली है जो न सिर्फ अपने पति की मौजूदगी में बल्कि अपने पति की गैर मौजूदगी में भी अपने घर और पति की इज्ज़त और आबरू का ख़याल रखती है और अपनी जिम्मेदारियों पर खरी उतरती है, ख़ुदा ने कुरआन में मर्दों को एसी औरतों के साथ बहुत ही सम्मान के साथ बर्ताव करने का हुक्म दिया है। दूसरी तरह की औरतें जिसका वर्णन कुरआन में किया गया वह है नाफरमान और अपनी जिम्मेदारियों को पूरा न करनेवाली और उससे अपना विरोध जतानेवाली औरतें। एसी औरतों के साथ किस तरह का व्यवहार किया जाए और मर्दों की क्या ज़िम्मेदारियाँ है इसका क्रमशः वर्णन किया गया है। ये ध्यान रहें, किसीभी परिस्थिति में अदालत की हदों को पार नहीं किया जाना चाहिए। एसी औरतें जो विद्रोह या विरोध पर उतर आये और अपने पति और घर की इज्ज़त और आबरू का ख़याल न रखें एसी औरतों के लिए सब से पहले कहा गया के उन्हें समझाया जाए और सलाह दी जाए और कोशिश की जाए के वह अपनी जिम्मेदारियों को समझे और उसपर अपना ध्यान केन्द्रित करें। अगर इसके बाद भी वह ना समझे और अपनी जिम्मेदारियों पर ध्यान ना दे और विद्रोह और विरोध पर डटी रहे तब एसी औरतों के बिस्तर से दूर होने को कहा गया जिसे हम बॉयकोट कह सकते है। इस तरह से मर्द अपनी नाराज़गी को दर्शाए के शायद यही एक छोटी सी सख्ती काम आ जाए और मुश्किल हल हो जाए। मगर, अगर इस तरह की नाराज़गी ज़ाहिर करने बाद भी औरत अपने विद्रोह और विरोध पर डटी रहे और अपनी जिम्मेदारियों को ना समझे तब जाके कुछ सख्ती करने को कहा गया है। कथन नम्बर 34 के आखरी हिस्से में एक बार फिर से मर्दों को याद दिलाया गया के वह परिवार के सरपरस्त और संरक्षक होने का गलत फ़ायदा न उठाये और ख़ुदा की कुदरत और ताकत को याद दिलाया गया और कहा गया के अल्लाह ही सर्वोपरि, सबसे उच्च, सबसे महान है।

कथन नंबर 35 में इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा गया के, अगर पति और पत्नी के बीच जुदाई का भय हो तो इसका कारण समझने के लिए और मुश्किल हल करने के लिए पति और पत्नी के घरवालों की तरफ से एक-एक प्रतिनिधि नियुक्त किया जाए। अगर उनका लक्ष्य दोनों (पति-पत्नी) के बीच मामला सुलझाना होगा तो ख़ुदा उनकी मदद करेगा और पति-पत्नी के बिच मोहब्बत पैदा करेगा। यहाँ ये बात भी याद दिलाई जा रही है के ख़ुदा लोगों की निय्यत और दिल का हाल जाननेवाला है।

कुछ ख़ास बिंदु:
(1) पारिवारिक वातावरण का केंद्रबिंदु भावना और प्रेम है। यहाँ जो रविश अपनाई जाए वह बाकी जगहों से तफावत रखती है। इसका अर्थ यह होता है के जिस तरह से बाकी गुनाहों की सुनवाई के वक्त न्यायलय में मोहब्बत, हमदर्दी और महेरबानी के साथ काम नहीं चल सकता; ठीक इससे उल्टा, पारिवारिक वातावरण में जहाँ तक हो सके जो भी मुश्किल हो इस बारेमें प्यार, मोहब्बत और महेरबानी के साथ हल तलाश किया जाना चाहिए। और इसीलिए यहाँ न्यायाधीश उसे बनाया जाता है जो दोनों (पति-पत्नी) के घरवालों में से हों।

(2) न्यायालय में जब कभी कोई केस जाता है तब दोनों तरफ के लोगों की तरफ से ये कोशिश की जाती है के फैसला उनके अपने पक्ष में आए और उसके लिए वह सामनेवाले के हर तरीके के राज़ (गुप्त बातें) भी लोगों के सामने बताते है। यह बात हर किसीके लिए स्वीकार्य है के जब पति-पत्नी अपने किसी केस को लेकर न्यायालय या किसी अजनबी के पास पहुँचते है और एक-दूसरें के राज़ (गुप्त बातें) बताते है तब अगर न्यायधीश उन दोनों पति-पत्नी को साथ रहने के लिए मजबूर भी कर दें तब भी अपने घर वापस आने के बाद उनके संबंध में वह मिठास बाकी नहीं रहेगी जो होनी चाहिए और सिर्फ मज़बूरी में अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाने की कोशिश करते रहेंगे।

(3) आमतौर पर न्यायालय के न्यायधीश इख्तेलाफ़ और असमानता बढ़ने की कोई परवाह नहीं करते चाहे मामला कितना भी आगे क्यों न बढ़ जाएँ, चाहे पति-पत्नी का घर क्यों न टूट जाएँ। जबकि परिवार का प्रतिनिधि अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करता है के पति-पत्नी एक-दुसरें से अलग न हों और किसी मानसिक परेशानी और तनाव का शिकार न बनने पाएँ।

(4) इन सब से हट के, आम न्यायालय में पति-पत्नी दोनों की तरफ से लाखों रुपए का खर्च, महीनो या बरसों तक न्यायालयों के चक्कर (तारीख़ पे तारीख़) और दुनियाभर की उलझने और परेशानी होती है और आखिर में नतीजा क्या निकलता है यह हम सब जानते ही है; जबकि इस्लाम में इन सारी परेशानियों से बचने का रास्ता और समाधान कुरआन में दिया गया है।

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