भारतीय चुनाव आयोग ने संप्रदायिक बयानबाज़ी के आगे डाले हथियार, क्या सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग की बढ़ाएगा शक्ति?

सुप्रीम कोर्ट में भारतीय चुनाव आयोग ने कहा कि हम केवल नोटिस जारी करके जवाब मांग सकते हैं, हमें किसी पार्टी के पहचान को रद्द करने या उम्मीदवार को अयोग्य ठहराने का अधिकार नहीं है।

प्राप्त रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत में आम चुनाव अपने चरम पर हैं इस बीच चुनावी रैलियों में धार्मिक और जातीय बयानबाज़ी करने वाली पार्टियों और नेताओं के ख़िलाफ़ कार्यवाही करने के संबंध में भारत के चुनाव आयोग की शक्तियों पर विचार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट तैयार हो गया है। मंगलवार को इस मामले की सुनवाई होगी। भारतीय प्रधानमंत्री सहित हाल ही में बसपा प्रमुख मायावती और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा धर्म के आधार पर वोट मांगने का मामला सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने चुनाव आयोग से पूछा कि ऐसी स्थिति में आचार संहिता के उल्लंघन को लेकर क्या कार्रवाई की जाती है?

प्राप्त जानकारी के अनुसार, भारतीय चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में बताया है कि संप्रदायिक बयानबाज़ियों सहित कई मामलों में चुनाव आयोग की शक्तियां बहुत सीमित है हम सिर्फ नोटिस जारी करके जवाब मांग सकते हैं, हमें किसी पार्टी के पहचान को रद्द करने या उम्मीदवार को अयोग्य ठहराने का अधिकार नहीं है। चुनाव आयोग ने कहा कि मायावती को 12 अप्रैल तक जवाब देने को कहा गया था लेकिन उन्होंने अभी तक कोई जवाब नहीं दिया, हम केवल निर्देश जारी कर सकते हैं और अगर बार-बार उल्लंघन होता है तो शिकायत दर्ज कर सकते हैं।

चुनाव आयोग की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए वकील संजय हेगड़े से जब मुख्य न्यायाधीश ने पूछा कि क्या चुनाव आयोग सांप्रदायिक बयानबाज़ी के आधार पर वोट मांगने वालों के ख़िलाफ़ सिर्फ इतनी ही कार्रवाई कर सकता है, इस पर हेगड़े ने कहा कि अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को कई सारी शक्तियां दी गई हैं। इस पर मुख्य न्यायाधीश गोगोई ने आयोग के एक वरिष्ठ प्रतिनिधि को निर्देश दिया कि शक्तियों पर विचार के दौरान कोर्ट में मौजूद रहें। हरप्रीत मनसुखानी नाम की एक एनआरआई ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मांग की है कि सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की अगुवाई में एक कमेटी गठित की जाए जो कि पूरी चुनावी प्रक्रिया पर नज़र रखे और चुनाव आयोग की भूमिका की भी जांच करे।

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