मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस, हालांकि इस्लाम की ओर से ऐसी कोई पाबंदी नहीं

सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाख़िल करने वाले पुणे के एक दंपति का कहना है कि उन्हें एक मस्जिद में नमाज़ पढ़ने से रोका गया था, जिसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दी थी।

इस याचिका के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, राष्ट्रीय महिला आयोग, सेंट्रल वक़्फ़ काउंसिल और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को एक नोटिस जारी किया है।

जस्टिस एस ए बोबड़े और जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर की पीठ ने कहा है कि कोर्ट सबरीमला पर अपने फ़ैसले की वजह से इस याचिका पर सुनवाई कर सकता है।

ग़ौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ ने पिछले साल अपने फ़ैसले में सबरीमला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश का मार्ग प्रशस्त कर दिया था।

सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि मंदिर में प्रवेश पर किसी भी प्रकार की पाबंदी लैंगिक भेदभाव के समान है।

याचिकाकर्ताओं ने संविधान के प्रावधान का हवाला देते हुए कहा कि देश के किसी भी नागरिक के साथ धर्म, जाति, वर्ग, लिंग या जन्मस्थान को लेकर भेदभाव नहीं होना चाहिए।

हालांकि इस्लाम धर्म के जानकारों का कहना है कि किसी भी मस्जिद या इस्लामी धार्मिक स्थल में इस्लाम की ओर से महिलाओं के प्रवेश पर कोई पाबंदी नहीं है।

इसी तरह महिलाएं मक्का और मदीना में इस्लाम के दो सबसे पवित्र स्थलों में प्रवेश करती हैं और नमाज़ के साथ दूसरी इबादतें आंजाम देती हैं।

इसके अलावा, दुनिया भर के मुस्लिम देशों में महिलाएं मस्जिदों में जाकर जमात के साथ नमाज़ अदा करती हैं, जिसकी तस्वीरें इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध हैं।

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