आतंकी हमले पर ईरान का इंतेक़ाम शुरू, पहला क़दम उठाया गया बहुत जल्द उठेंगे दूसरे बड़े क़दम

आत्मघाती हमलावार पाकिस्तानी नागरिक था जिसका हाफ़िज़ मुहम्मद अली था। इसके अलावा भी आतंकी टीम के दो सदस्य पाकिस्तानी थे। पहले एक महिला को गिरफ़तार किया गया जिसने आतंकी टीम के अन्य सदस्यों के नाम बताए।

पासदाराने इंक़ेलाब फ़ोर्स में इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता के प्रतिनिधि हुज्जतुल इस्लाम अब्दुल्ला हाजी सादेक़ी का कहना है कि ईरान ने इंतेक़ाम की कार्रवाई शुरू कर दी है और पहला क़दम भी उठा लिया है। पहला क़दम हमला अंजाम देने वाली आतंकी टीम की गिरफ़तारी है जबकि बहुत जल्द और भी क़दम उठाए जाएंगे। उनका कहना था कि बहुत जल्द महत्वपूर्ण सूचनाएं देश की जनता को मिलेंगी।

पाकिस्तान के वरिष्ठ सुन्नी धर्मगुरु मौलाना आमिर शहज़ाद का कहना है कि सऊदी क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान पूरे इलाक़े में अशांति और अस्थिरता का मुख्य कारण हैं। उन्होंने कहा कि खेद की बात है कि सऊदी ख़ानदान की दौलत मुसलमानों के विकास के लिए नहीं बल्कि युद्ध और तनाव पैदा करने पर ख़र्च हो रही है। यमन युद्ध तथा कई जगहों पर मुसलमानों का क़त्ले आम सब कुछ सऊदी अरब के उन पैसों से हो रहा है जो वह हाजियों से कमाता है या ईश्वर की दी हुई तेल की नेमत को बेच कर हासिल करता है।

यह मुद्दा महत्वपूर्ण है कि सऊदी अरब के साथ ही संयुक्त अरब इमारात तथा कुछ अन्य देश आतंकवाद को बढ़ावा दे रहे हैं। सऊदी अरब आतंकवाद की मानसिकता के प्रचार के साथ ही आतंकियों की सामरिक और आर्थिक सहायता करता है। सऊदी अरब ने कई दशकों तक बहुत धीरे धीरे और ख़ामोशी से यह काम किया लेकिन कुछ समय बीतने के साथ ही सारी दुनिया को सऊदी अरब की विध्वंसकारी भूमिका का आभास होने लगा और जब इस्लामी दुनिया के साथ ही यूरोप और अमरीका में आतंकी हमले शुरू हो गए तो फिर सऊदी अरब के ख़िलाफ़ आवाज़ें उठने लगीं।

सऊदी अरब अपने ख़िलाफ़ उठने वाली आवाज़ों को आम तौर पर पैसे के बलबूते पर दबाता रहा है। मगर हालिया कुछ दशकों से सऊदी अरब की नीतियों को लगातार नाकामी का सामना करना पड़ा। सऊदी अरब को लेबनान में पराजित होना पड़ा और वह धड़ा आपस में ही बंट गया जिसे सऊदी अरब हिज़्बुल्लाह और उसके घटक दलों के ख़िलाफ़ प्रयोग करना चाहता था। सऊदी अरब को जार्डन में नाकामी हाथ लगी और जार्डन इस समय सऊदी अरब की नीतियों से काफ़ी दूर हो चुका है, क़तर से सऊदी अरब का विवाद अपनी चरम सीमा पर पुहंच चुका है।

सऊदी अरब ने दो साल पहले तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोग़ान को रियाज़ बुलाया उनका भरपूर स्वागत किया और तुर्की से स्ट्रैटैजिक सहयोग के विषय पर सहमति बनी मगर आज स्थिति यह है कि सऊदी अरब तुर्की को अपना सबसे बड़ा दुशमन मानता है, वैसे समझौता हो जाने के बावजूद तुर्की को अच्छी तरह पता था कि सऊदी नेतृत्व के दिल में तुर्की के प्रति किस प्रकार की भावनाएं हैं। वरिष्ठ पत्रकार जमाल ख़ाशुक़जी की हत्या के बाद इस मुद्दे को जिस तरह तुर्की ने विश्व स्तर पर उठाया और अब तक उठा रहा है उसके बाद तो तुर्की और सऊदी अरब की दुशमनी चरम सीमा पर पहुंच गई है। वैसे क़तर का संकट शुरू होने के साथ ही तुर्की और सऊदी अरब के संबंध बहुत ख़राब हो गए थे क्योंकि तुर्की ने क़तर की रक्षा के लिए अपने 30 हज़ार से अधिक सैनिक क़तर भेज दिए थे।

सीरिया में अपनी मर्ज़ी की सरकार लाने के चक्कर में सऊदी अरब बेहद भयानक साज़िश का हिस्सा बना जिससे सीरया ध्वस्त होकर रह गया लेकिन सऊदी अरब की योजना कामयाब नहीं हो पायी। यमन में भी सऊदी अरब ने वही कोशिश की मगर इस बार प्राक्सी संगठनों का प्रयोग करने के साथ ही सऊदी अरब प्रत्यक्ष रूप से युद्ध में कूद पड़ा। यमन में भी उसे पूरी तरह नाकामी हाथ लगी।

सऊदी अरब इस समय पाकिस्तान पर ध्यान केन्द्रित कर रहा है। सऊदी अरब ने पाकिस्तान में 20 अरब डालर से अधिक का निवेश करने का एलान किया है और सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर हुए हैं मगर यह तय है कि अन्य देशों की तरह पाकिस्तान में भी सऊदी अरब का निवेश केवल आर्थिक योजनाओं तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पाकिस्तान में भी वह अपनी विध्वंसकारी योजनाओं को लागू करने और आगे बढ़ाने की कोशिश करेगा। पाकिस्तान की धरती का प्रयोग करके ईरान के ख़िलाफ़ हमले करवाना सऊदी अरब की घोषित नीति है यह किसी से ढंकी छिपी नहीं है। अब देखना यह है कि पाकिस्तान सरकार कब तक अपनी धरती को ईरान के खिलाफ़ सऊदी अरब के प्राक्सी संगठनों की आतंकी गतिविधियों के अड्डे के रूप में प्रयोग होता देखती रहेगी?

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