अयोध्या मसले पर 26 से सुनवाई करेगी सुप्रीम कोर्ट की संविधान बेंच

नई दिल्ली, 20 फरवरी (वेबवार्ता)। अयोध्या मसले पर सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान बेंच 26 फरवरी को सुनवाई करेगी। इस संविधान बेंच में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के अलावा जस्टिस एस ए बोब्डे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस अब्दुल नजीर शामिल हैं। इस मसले पर पिछले 29 जनवरी को सुनवाई होनी थी लेकिन जस्टिस एसए बोब्डे के उपलब्ध नहीं होने की वजह से सुनवाई टल गई थी। पिछले 10 जनवरी को जस्टिस यूयू ललित ने वकील राजीव धवन की ओर से एतराज जताए जाने के बाद खुद ही बेंच से हटने की बात कही थी। धवन ने कहा था कि 1995 में जस्टिस ललित बतौर वकील यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के लिए पेश हुए थे। जस्टिस यूयू ललित के सुनवाई से हटने की वजह से सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई टाल दी थी। अयोध्या मामले में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल कर अविवादित जमीन से यथास्थिति का आदेश वापस लेने की मांग की है। केंद्र सरकार ने 67 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था और सिर्फ 0.313 एकड़ जमीन पर विवाद है। बाकी जमीन को रिलीज करने के लिए याचिका दायर की गई है। इस्माइल फारुकी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ही कहा है कि जो जमीन बचेगी उसे उसके सही मालिक को वापस करने के लिए केंद्र सरकार बाध्य है। इसमें 40 एकड़ जमीन राम जन्मभूमि न्यास की है। हम चाहते हैं कि इसे उन्हें वापस कर दी जाए। केंद्र सरकार ने कहा है कि जमीन वापस करते समय यह देखा जा सकता है कि विवादित भूमि तक पहुंच का रास्ता बना रहे। उसके अलावा जमीन वापस कर दी जाए । केंद्र सरकार ने याचिका में कहा है कि 2003 में जब सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर में शिलापूजन की अनुमति नहीं दी थी तो विवादित भूमि और अधिगृहित की गई 67 एकड़ की जमीन पर यथास्थिति बहाल रखने का आदेश दिया था। केंद्र सरकार ने 1993 में इस जमीन का अधिग्रहण किया था। । भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली अखिल भारतीय हिन्दू महासभा और 7 रामभक्तों की याचिकाओं पर भी सुप्रीम कोर्ट 26 फरवरी को ही सुनवाई करेगा। 27 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत के फैसले से अयोध्या मसले पर फैसला सुनाते हुए कहा था कि इस्माइल फारुकी का मस्जिद संबंधी जजमेंट अधिग्रहण से जुड़ा हुआ था। इसलिए इस मसले को बड़ी बेंच को नहीं भेजा जाएगा। जस्टिस अशोक भूषण ने फैसला सुनाया था जो उनके और चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा का फैसला था। जस्टिस एस अब्दुल नजीर ने अपने फैसले में कहा कि इस्माईल फारुकी के फैसले पर पुनर्विचार के लिए बड़ी बेंच को भेजा जाए।

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